FCRA संशोधन बिल से विपक्ष को करंट क्यों?
- FCRA संशोधन 2026 पर विपक्ष इतना बेचैन क्यों? विदेशी फंडिंग, धर्मांतरण और टेरर फंडिंग के नैरेटिव*Y your T
विपक्ष संसद में FCRA संशोधन बिल 2026 का विरोध कर रहा है। सड़क पर ‘काक्रोच जनता पार्टी’ के बैनर तले ‘चलो संसद’ मार्च निकाला गया। सरकार कह रही है कि यह संशोधन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है।
सवाल सीधा है: विपक्ष को इस बिल से दिक्कत क्या है? क्या इस विरोध से विपक्ष खुद ही एक्सपोज हो रहा है? और 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर भीड़ जुटाने वाली ‘काक्रोच जनता पार्टी’ का इस पूरे खेल में रोल क्या है?
*1. FCRA संशोधन 2026: क्या बदल रहा है और क्यों ?*
सरकार ने FCRA में चार बड़े बदलाव प्रस्तावित किए हैं। पहला, NGO के प्रशासनिक खर्च की सीमा 20% से घटाकर 15% की जा रही है। मकसद यह है कि विदेश से आया पैसा सैलरी, विदेश यात्राओं और फाइव-स्टार होटलों के सेमिनार में न खर्च होकर सीधे जमीन पर काम में लगे।
दूसरा, FCRA रजिस्टर्ड NGO के सभी पदाधिकारियों के लिए आधार नंबर अनिवार्य किया गया है। गृह मंत्रालय की दलील है कि 2010 से 2024 के बीच 20,000 से ज्यादा NGO के लाइसेंस रद्द किए गए। इनमें से बड़ी संख्या में NGO के पते फर्जी थे या पदाधिकारी मौजूद ही नहीं थे। आधार से बेनामी लोगों पर रोक लगेगी।
तीसरा, सभी NGO को अपना FCRA खाता सिर्फ SBI की दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में खोलना होगा। अभी तक NGO किसी भी बैंक में खाता खोल सकते थे। सरकार कहती है कि एक जगह खाता होने से फंड फ्लो की रियल-टाइम मॉनिटरिंग होगी। एजेंसियों को पता रहेगा कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ।
चौथा, “जनहित के प्रतिकूल गतिविधि” पर रोक को और सख्त किया गया है। अगर कोई NGO ऐसी गतिविधि में शामिल पाया गया तो उसका लाइसेंस तत्काल रद्द होगा।
*2. विपक्ष विरोध क्यों कर रहा है: उनके 4 बड़े तर्क*
विपक्षी दलों ने लोकसभा और राज्यसभा में इस बिल का तीखा विरोध किया है। कांग्रेस का कहना है कि यह बिल नागरिक समाज की आवाज दबाने के लिए लाया गया है। TMC ने इसे “संघीय ढांचे पर हमला” बताया क्योंकि SBI दिल्ली वाली शर्त से राज्यों के छोटे NGO को दिक्कत होगी।
DMK और वाम दलों का तर्क है कि “जनहित के प्रतिकूल” की परिभाषा साफ नहीं है। सरकार किसी भी मानवाधिकार या पर्यावरण NGO को इस धारा में फंसा सकती है। 2022 में७/ ऑक्सफैम इंडिया और 2023 में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च का FCRA लाइसेंस रद्द होने का उदाहरण दिया जा रहा है।
विपक्ष का चौथा तर्क टाइमिंग को लेकर है। बिल मानसून सत्र 2026 में लाया गया जब सरकार NEET पेपर लीक, महंगाई और बेरोजगारी पर घिरी थी। विपक्ष का आरोप है कि असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए FCRA को हथियार बनाया जा रहा है।
*3.अमेरिका की बेचैनी और ‘चलो संसद’ की टाइमिंग: बिल के देशहित में होने का सबूत*
अमेरिका FCRA बिल 2026 से चिंतित था क्योंकि उसके कई NGO और चर्च संगठन भारत में धर्मांतरण और नीतिगत हस्तक्षेप के लिए फंडिंग करते थे। बिल से पहले US थिंक-टैंक और विदेश मंत्रालय की रिपोर्टों में “भारत में नागरिक स्पेस सिकुड़ने” पर बयान आए, जिससे साफ था कि उन्हें बिल की भनक पहले से थी। ठीक उसी समय अभिजीत दीपके का ‘चलो संसद’ आंदोलन उग्र करना और विदेशी मीडिया में उसे तुरंत कवरेज मिलना संयोग नहीं था। धर्मांतरण, टेरर फंडिंग और रेजीम चेंज की कोशिशों पर लगाम लगाने वाले बिल का विरोध होना ही साबित करता है कि यह कानून देशहित में है
*4. क्या इस विरोध से विपक्ष एक्सपोज हो रहा है?*?
सरकार और भाजपा का सीधा आरोप है कि विपक्ष का विरोध “विदेशी फंडिंग पर पलने वाले इकोसिस्टम” को बचाने के लिए है। इसके तीन बड़े कारण गिनाए जा रहे हैं।
पहला कारण: विदेशी फंडिंग से धर्मांतरण। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2018 से 2023 के बीच FCRA के तहत भारत आए 55,000 करोड़ रुपये में से 10% से ज्यादा हिस्सा “धार्मिक गतिविधियों” के नाम पर खर्च हुआ। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के आदिवासी जिलों में कई NGO पर आरोप लगे कि उन्होंने विदेशी पैसे से चर्च, प्रार्थना सभा और मेडिकल कैंप की आड़ में धर्मांतरण कराया। 2021 में उत्तर प्रदेश में ‘लव जिहाद’ कानून लाने की एक बड़ी वजह भी यही थी। जब FCRA सख्त होगा तो ऐसी फंडिंग पर लगाम लगेगी। विपक्ष का विरोध इसीलिए सवालों के घेरे में है।
दूसरा कारण: टेरर फंडिंग में इस्तेमाल। NIA की चार्जशीट में कई बार यह बात सामने आई है कि PFI जैसे प्रतिबंधित संगठनों को खाड़ी देशों से FCRA के जरिए पैसा मिला। 2022 में PFI पर बैन लगाने से पहले जांच में पता चला था कि केरल और कर्नाटक में उसके कई फ्रंटल NGO सक्रिय थे। उनके बैंक खातों में तुर्की, कतर और कुवैत से पैसा आया था। 2019 पुलवामा हमले की जांच में भी एक कश्मीरी NGO की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी जिसे विदेश से फंडिंग मिली थी। जब सरकार ऐसे चैनलों पर रोक लगा रही है तो विपक्ष का विरोध जनता के बीच गलत संदेश देता है।
NGO की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी जिसे विदेश से फंडिंग मिली थी। जब सरकार ऐसे चैनलों पर रोक लगा रही है तो विपक्ष का विरोध जनता के बीच गलत संदेश देता है।
तीसरा कारण: दोहरा मापदंड। 2010 में UPA सरकार ने ही FCRA को सख्त किया था। तब मनमोहन सिंह सरकार ने 4,000 से ज्यादा NGO के लाइसेंस रद्द किए थे। उस समय कांग्रेस ने कहा था कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। आज वही कांग्रेस संशोधन को “लोकतंत्र की हत्या” बता रही है। भाजपा यही पूछ रही है कि 2010 में जो राष्ट्रहित था, 2026 में अलोकतांत्रिक कैसे हो गया?
CSDS का 2024 का सर्वे बताता है कि 62% भारतीय चाहते हैं कि विदेशी फंडिंग की सख्त जांच हो। ऐसे में अगर विपक्ष सिर्फ तकनीकी आपत्ति जताने के बजाय बिल को पूरी तरह खारिज करता है तो उसका राजनीतिक नुकसान हो सकता है।
*5. ‘काक्रोच जनता पार्टी’ पर सवालिया निशान*
20 जुलाई 2026 को ‘चलो संसद’ मार्च का आह्वान ‘काक्रोच जनता पार्टी’ ने किया था। NEET पेपर लीक के मुद्दे पर युवाओं की भीड़ जंतर-मंतर पर जुटी। पुलिस लाठीचार्ज हुआ। RAF जवान ने पैलेट गन से 7 राउंड फायर किए। 3 लोग घायल हुए। इस बवाल के बाद धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।
‘काक्रोच जनता पार्टी’ कोई रजिस्टर्ड राजनीतिक दल नहीं है। चुनाव आयोग की लिस्ट में इसका नाम नहीं है। MHA के पास इसका कोई FCRA लाइसेंस नहीं है। यह सिर्फ सोशल मीडिया पर चलने वाला एक पेज है जो मीम, रील और पोस्टर के जरिए एजेंडा सेट करता है।
