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मनुस्मृति से अनभिज्ञ राहुल विंची गांधी

बेशर्मी की सीमा लांघता राहुल पप्पू गांधी

जो बेशर्म बेगैरत इंसान सार्वजनिक मंच पर अपनी बहन की गाल और होंठ पर कसकर चुम्बन लेने में शर्म नहीं करता हैं, वो सनातन और हिन्दू धर्म की महिलाओं को अपमानित करने में कैसी शर्म महसूस करेगा?

राहुल गांधी हिंदू लड़की और महिलाओं को सनातन धर्म के खिलाफ बरगलाने का काम कर रहा है। अभी हाल में मनुस्मृति पर जहर उगलते हुए बोला कि हिंदू महिलाएं गुलाम है, मनुस्मृति ने उन्हें पिंजरे में कैद कर रखा है।

उसने एक चित्र द्वारा संकेत दिया है जिसमें तीन महिलाएं दिखाई गई हैं। चित्र में पहली ईसाई है, दूसरी मुस्लिम, और तीसरी साड़ी में मनुस्मृति द्वारा गुलाम बनाई हुई महिला है।

राहुल गांधी चाहते है कि हिंदू महिलाएं अपनी सनातनी परंपरा से बगावत कर मुस्लिम या ईसाई बनकर खुद को प्रगतिशील बनाए

इसे अज्ञानता कहें या सोची समझी दुर्भावनापूर्ण साजिश जो इस दुष्ट प्रवृत्ति के इंसान राहुल पप्पू भारत-विरोधी प्रतिपक्ष नेता की हिंदुओं और सनातन के प्रति घृणा को प्रकट करती हैं, इसीलिए वह झूठ परोसकर सनातन संस्कृति और हिन्दू धर्म ग्रंथों का अपमान कर हिन्दू स्त्रियों के प्रति अपशब्द और विकृत नैरेटिव सेट करने से भी नहीं हिचकिचाता।

मनुस्मृति पर हमारा ये लेख राहुल विंची के मुंह पर एक थप्पड़ है।।

मनुस्मृति में नारी-सशक्तिकरण के कुछ महत्वपूर्ण उध्दरण:

मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। क्या नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर समझ रखते हैं राहुल विंची?

मनुस्मृति कहती है कि शारीरिक परिपक्वता के बाद निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही लड़की का विवाह हो, उस समय के हिसाब से 17 वर्ष तक। बाल-विवाह के विरुद्ध इससे बेहतर कोई प्रमाण है आपके पास?

मनुस्मृति कहती है – “विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर परिभाषित कर सकते हैं आप?

पुत्रेण दुहिता समा” – अर्थात, पुत्री पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर कुछ ला सकते हैं आप?

क़ुरान या बाइबिल लेकर आइए, देख लीजिए। स्वयं डॉ आंबेडकर ने बुढ़ापे में मनुस्मृति का लोहा माना है, उत्तराधिकार वाले विषय को लेकर। मनुस्मृति माता की निजी संपत्ति को अलग से मान्यता देती है और उसे अविवाहित पुत्री का भाग बताती है। परिवार में महिलाओं को सशक्त रखने के लिए इससे बेहतर कोई व्यवस्था अबतक लेकर आए आप?

बल, दबाव या जबरन नियंत्रण से स्त्रियों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। विश्वसनीय पुरुष भी उन्हें क़ैद नहीं रख सकते।

आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः– अर्थात, जो स्त्री अपने विवेक से अपनी रक्षा करती है, वही सुरक्षित है। बाहरी निगरानी से ऊपर विवेक को रखा गया है। स्त्रियों को विवेकी माना गया है। इससे अधिक सम्मान देते हैं आप?

धन के देखभाल एवं प्रबंधन के लिए मनुस्मृति ने स्त्रियों पर विश्वास जताया है। राजा को मनुस्मृति आदेश देती है कि ऐसी स्त्रियों की रक्षा करे जिनके पति बाहर हैं, जिनका परिवार प्रभावशाली नहीं है, जो बीमार हैं या जिनके पति या पुत्र नहीं हैं। अगर कोई संबंधी भी किसी स्त्री की संपत्ति हड़पता है तो उसे चोर मानकर दंड देने को कहा है। इससे अधिक परवाह है आपको स्त्रियों की?

पति को आदेश है कि बाहर जाने से पहले पत्नी की आजीविका की व्यवस्था करके जाए। अब ये मत कहिएगा कि पत्नी ख़ुद नहीं कर सकती क्या।

जीवेच्छिल्पैर गर्हितः– आगे ये भी लिखा है कि पति न करे तो स्त्री ख़ुद सम्मानजनक कार्यों के जरिए कमाए। आत्मनिर्भरता के लिए इससे बेहतर नियम बना लेंगे आप?

तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः- धार्मिक कार्य पति-पत्नी साथ मिलकर करें। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। हमारे यहाँ पत्नी को बेगम नहीं, अर्धांगिनी कहा गया है। यहीं से निकला है, आधी आबादी। पूरे पचास प्रतिशत – उतना ही, जितना पुरुष का हिस्सा। पचास-पचास। इससे एक-दूसरे के प्रति। वैवाहिक जीवन में भी दोनों की जिम्मेदारियां हैं।

मनुस्मृति कहती है कि न स्त्री और न ही पुरुष वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करे। इसमें क्या जोड़ देंगे आप क्रांतिकारी कहलाने के लिए? कुछ बाक़ी है क्या? मनुस्मृति कहती है कि नियम दोनों पर हैं।

मनुस्मृति ने स्त्री को महाभागाः सौभाग्य शालिनी और सौभाग्य लाने वाली कहा।

मनुस्मृति ने स्त्री को पूजार्हाः सम्मान की अधिकारी कहा।

मनुस्मृति ने स्त्री को गृह दीप्तयः घर को प्रकाशित और प्रसन्न रखने वाली कहा। परिवार के सुख का आधार कहा। गृहस्थ-जीवन का प्रत्यक्ष आधार कहा।

अब जिसने परिवार नामक संस्था को ख़त्म करने का लक्ष्य ले रखा हो, उसे ये सब बुरा लगेगा ही। वो पूछेगा कि स्त्री परिवार के सुख के लिए तिनका भी क्यों हिलाए। वो ये नहीं पूछेगा कि मनुस्मृति ने पुरुष को भी स्त्री के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाने को क्यों कहा है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रटा-रटाया है, इसीलिए इसे नहीं गिनाया। सबको पता है। इसी प्रसंग में ये भी लिखा है कि जिस घर में स्त्री दुखी रहती है वह परिवार शीघ्र नष्ट होता है। यानी, परिवार की स्थिति का पैमाना यह तय कर दिया गया है कि उसमें महिलाओं को प्रसन्न रखा जा रहा है या नहीं।

लेकिन नहीं, गाली तो केवल मनुस्मृति को ही पड़ेगी। कुरान और बाइबिल का नाम नहीं लिया जाएगा। राहुल गांधी आज स्त्रीवादी बने हैं, काश मनुस्मृति पढ़ लिया होता कम से कम। पढ़ा तो हिंदुओं ने भी पूरा नहीं है क्योंकि हिंदुओं को उनके अपने धर्म ग्रंथ पढ़ने का अधिकार ही स्कूलों में नहीं दिया, इसलिए जो कहा जाता है, वो मान लेते हैं और सफाई देने लगते हैं कि ये उस समय की व्यवस्था थी। लेकिन ऊपर कही चुनिंदा बातें भी किसी भी समझदार को समझने के लिए पर्याप्त हैं कि हिन्दू धर्म ग्रंथों और विशेषकर मनुस्मृति में नारी का कितना आदर किया गया है और नारी सशक्तिकरण की मिसाल कायम की है।

अब राहुल गांधी हिंदू लड़की और महिलाओं को सनातन धर्म के खिलाफ बरगलाने का काम कर रहा है। इसलिए इस लेख के द्वारा हम राहुल विंची के साथ उसके परिवार वालों और पार्टी के चमचों को भी आगाह करना चाहते हैं कि वे बार बार हिन्दू धर्म और सनातन संस्कृति व शास्त्रों को बदनाम करना बन्द करें अन्यथा हमारे धैर्य जा पैमाना यदि छलक गया तो उसके खानदान और ईसाइयत का कच्चा चिट्ठा खोलते समय हम ये भूल जाएंगे कि इससे राहुल की माँ का अपमान हो रहा है या राहुल की बहन का? फिर हम इसकी तह में जाकर सार्वजनिक ढंग से ये सवाल भी पूछेंगे कि वो बार बार थाईलैंड में किसकी ससुराल में क्या ऐश आराम करने जाता हैं। फिर यदि हम उसके धर्मग्रंथों पर विवेचना करेंगे तो उसको तन बदन में आग नहीं लगनी चाहिए।

अस्तु,

जागो और जगाओ भारत, ढोंग्रेस मुक्त बनाओ भारत

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