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होप इंडिया का चुनावी जन जागरण अभियान 2005

2005 में प्रो. सौरभ सर के नेतृत्व में होप इंडिया फाउंडेशन नाम के एक NGO ने चुनावी जन जागरण अभियान का सूत्रपात किया था जिसका पहला नारा था – If you love your country, come out to cast your vote….

बाद में यह अभियान अनेक गैर सरकारी संस्थाओं और मीडिया हाउसेस का पसंदीदा अभियान बन गया और टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप ने 27 NGOs का फेडरेशन बनाकर इस अभियान को पूरे देश में प्रचारित प्रसारित करवाया जो आज भारतीय लोकतंत्र में मील का पत्थर बन गया है जिसने चुनावी राजनीति की सैंकड़ों लाइलाज कुरीतियों को गहराई से खत्म कर दिया। नई पीढ़ी के वोटर्स को यह जानना जरूरी है कि पहले देश मे चुनाव कैसे होते थे और कैसे सरकारें बनती थी, किनके वोटों से बनती थी और कितने एवं कौन देशवासी किस तरह और किस आधार पर वोट करते थे, इसका अंदाज़ा होप इंडिया के चुनावी जन जागरण अभियान के 10 बिंदुओं और मुख्य नारे – “वोट इंडिया 100% Right” से लगा सकते हैं।

इस अनूठे और क्रांतिकारी अभियान का आईडिया होप इंडिया की कोर टीम के अध्यक्ष फाउंडर और मुंबई यूनिवर्सिटी के भूतपूर्व निदेशक रहे प्रो. सौरभ सर के मस्तिष्क में तब आया जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर एक Tiger बैठा था.

बैठा तो वह कुर्सी पर ही था, लेकिन असर ऐसा था कि कई नेता अपनी-अपनी कुर्सियों को थोड़ा संभालकर बैठने लगे थे.

नाम था- टी. एन. शेषन,

1990 की ठंडी दिसंबर की सुबह ,देश का दसवाँ मुख्य चुनाव आयुक्त पद संभालते ही उन्होंने पहला फरमान सुनाया मैं भारत सरकार का मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं हूँ मैं भारत का मुख्य चुनाव आयुक्त हूँ .लिफाफों से गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के शब्द मिटवा दिए गए मानो किसी ने मंदिर के गर्भगृह से राजकीय मुहर हटा दी हो
सत्ता हिल गई,नेतागण फुसफुसाने लगे यह आदमी पागल है या देवता? फिर शुरू हुआ महायज्ञ.

आचार संहिता, जो अब तक कागजों में सोई पड़ी थी, अचानक जाग उठी। शेषन ने उसे हथियार बना दिया। न शराब बँटेगी, न दीवारों पर नारे लिखे जाएँगे, न सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग होगा, न जाति-धर्म के नाम पर वोट माँगे जाएँगे। जो उल्लंघन करेगा, चुनाव रद्द.

एक मुख्यमंत्री ने कहा यह पगला सांड है। शेषन मुस्कुराए,कुर्सी नहीं हिली.

प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तक को संदेश गया। दो केंद्रीय मंत्री सिताराम केसरी और कल्पनाथ राय मतदाताओं को प्रभावित करने के आरोप में घिरे। प्रधानमंत्री को आश्वासन देना पड़ा.

हिमाचल के राज्यपाल की कुर्सी डोल गई। नेता अपनी-अपनी कुर्सियाँ संभालकर बैठे। कोई जोर से नहीं बोल रहा था। कोई दीवार पर नारा नहीं लिख रहा था . लाउडस्पीकर चुप थे.

मतदाता पहचान पत्र का जन्म हुआ,खर्च की सीमा बँधी। खाते माँगे गए। हजारों प्रत्याशी अयोग्य घोषित हुए। शेषन ने एक कमरे में बैठकर पूरे देश के चुनाव खर्च पर नजर रखी, जैसे कोई सम्राट अपने साम्राज्य की नब्ज टटोल रहा हो.

राजनीति ने उनसे कहा आप सीमा पार कर रहे हैं.
शेषन ने जवाब दिया मेरी सीमा संविधान है।
कुछ ने महाभियोग की बात की। कुछ ने उन्हें अहंकारी कहा। लेकिन जनता ने उन्हें रामोन मैग्सेसे पुरस्कार दिया लोकतंत्र के महायज्ञ के महापुरोहित कहा,

यद्यपि शेषन के इस महायज्ञ को पूर्णाहुति तक आने में 30 वर्षों से अधिक का समय लगा जिससे आप आज के चुनावों में आधुनिक तकनीक और पारदर्शिता के साथ अहिंसक एवं निष्पक्ष आयोजन के रूप में देख रहे हैं जिसकी अंतिम परिणीति पूरे देश ने हाल ही में मई 2026 में सम्पन्न पश्चिम बंगाल के चुनावों की सफलता में देखी। किंतु इसकी वास्तविक शुरुआत शेषन द्वारा निर्धारित रोडमैप के धरातल पर उतारने का सूत्रपात उनके द्वारा प्रारम्भ करने के 15 वर्षों बाद जनता की भागीदारी और जागरूकता से शुरू हुई जिसकी पहल होप इंडिया फाउंडेशन ने 2005 में हजारों पत्रक छपवाकर और जन जन तक चुनावों के महत्व और पारदर्शिता पर गोष्ठियां और सभाएं करके पनवेल से प्रारम्भ की थी जिसे देश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं और मीडिया हाउसेस ने आगे बढ़ाकर जन आंदोलन का रूप दिया। आज देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े महापर्व की सफलता और विश्वव्यापी सराहना का श्रेय इसी अभियान को जाता है जिसकी प्रेरणा के केंद्र में रहा एक ऐसा नाम जिससे आज की पीढ़ी के भारतीय पूरी तरह अनभिज्ञ है – टी एन शेषन….

इसके साथ ही इस अभियान को जन आंदोलन के रूप में विकसित करने की पहल का श्रेय जाता है – होप इंडिया के फाउंडर प्रेसीडेंट प्रो. सौरभ सर जिन्होंने कथनी और करनी के अंतर को मिटाते हुए न केवल इन जन आंदोलन का सूत्रपात किया बल्कि इस महापर्व में पढ़े लिखे और ईमानदार भारतीयों को आगे बढ़कर भागीदारी करने के लिए प्रेरित करने हेतु अपनी अर्धांगिनी का भी उनकी अनिच्छा के बावजूद राजनीति में पदार्पण किया, (तथापि अल्पकाल के लिए) ताकि औरों को भी राजनीति में प्रवेश का प्रोत्साहन मिले।

इतिहास कभी-कभी एक आदमी को चुनता है, ताकि बाकी सबको याद रहे… कि कुर्सी कितनी भी बड़ी हो, संविधान उससे बड़ा होता है; और आज जो चुनावों का स्वरूप और सफल प्रयोग देख रहे हैं उसकी नींव के पत्थर कौन, कहाँ से और कैसे बने है।​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​ आशा है – आज के भारतीय उनसे प्रेरणा लेकर ऐसे ही क्रांतिकारी प्रयासों से भारत को सुपर पॉवर और जगतगुरु बनाने की दिशा में अग्रसर होंगे।

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