आज की कहानीकहानियों का बगीचा (Audio)जन जागरणमैनेजमेंट & मनोविज्ञान

माँ की याद

कृपया इस कहानी को अंत तक पढ़ें

“बेटा… माफ़ करना, मैंने तुम्हें बार-बार परेशान किया… बस एक……

जब फोन की दूसरी तरफ से मेरी 65 साल की बूढ़ी माँ ने रोआंसी आवाज़ में मुझसे ये शब्द कहे, तो दिल्ली की चिलचिलाती एसी में भी मेरे माथे पर पसीना आ गया। पैर तले ज़मीन खिसकना क्या होता है, मुझे उस रात समझ आया। जिस माँ ने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वो आज मुझसे बात करने के लिए माफ़ी मांग रही थी? आखिर मुझसे कहाँ चूक हो गई थी?

​वह एक आम सा, बेहद व्यस्त और तनाव भरा दिन था। ऑफिस के प्रोजेक्ट्स की डेडलाइन सिर पर थी, लैपटॉप पर लगातार ईमेल की घंटी बज रही थी, बच्चों की स्कूल की ज़िम्मेदारियाँ और घर के सौ काम… सब कुछ एक साथ मेरे दिमाग पर हावी था।

​इसी आपाधापी के बीच, फोन की स्क्रीन चमकी—’MOM’ Calling…

मैंने एक झटके में फोन काटा और खुद से बुदबुदाया, “हूँह! इस वक्त माँ को न जाने क्या काम आ गया।”

​पाँच मिनट बाद फिर से घंटी बजी। मैंने झुंझलाते हुए दोबारा लाल बटन दबा दिया और मन में सोचा: “बाद में बात कर लूंगा… अभी बहुत ज़रूरी काम में व्यस्त हूँ।”

​लेकिन हम सब जानते हैं कि इस डिजिटल दुनिया का वो “बाद में” अक्सर कभी नहीं आता। हम रील्स स्क्रॉल करने के लिए वक़्त निकाल लेते हैं, लेकिन अपनों के लिए वो ‘बाद में’ हफ़्तों में बदल जाता है।

​रात के करीब ग्यारह बज चुके थे। सारे कामों से निपटकर जब मैंने राहत की सांस ली, तो मुझे माँ के उन दो मिसकॉल्स की याद आई। मैंने थोड़ा थका हुआ महसूस करते हुए उन्हें वापस कॉल किया।

​आश्चर्य की बात यह थी कि फोन में पहली ही घंटी पूरी नहीं हुई और फोन उठ गया… जैसे वह हाथ में फोन लिए घंटों से सिर्फ मेरी ही रिंगटोन बजने का इंतज़ार कर रही हों।

​उनकी आवाज़ में हमेशा की तरह वही ममता भरी, हल्की सी मुस्कान थी:

“बेटा… माफ़ करना, मैंने दिन में तुम्हें बार-बार परेशान किया… तुम काम में होगे ना?”

​मैं अंदर से थोड़ा असहज हो गया। मैंने कहा, “माँ! क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? इतनी रात को आप जगी हुई हैं?”

​वह धीरे से, संकोच करते हुए बोलीं:

“हाँ सब ठीक है बेटा। कुछ खास नहीं… बस रसोई का एक अचार का जार था, बहुत टाइट था, मुझसे खुल नहीं रहा था। सोचा तुमसे पूछ लूँ कि कोई आसान तरीका है क्या… फिर मैंने खुद ही थोड़ी देर बाद कपड़े से पकड़कर खोल लिया। तुम बहुत व्यस्त रहते हो, बार-बार फोन करने के लिए माफ़ी।”

​उनकी आवाज़ के आखिरी शब्दों में एक अजीब सा सूनापन और एक गहरी उदासी थी, जिसे वह अपनी झूठी मुस्कान के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

​मैंने तुरंत कहा: “माँ… आप इतनी छोटी सी बात के लिए मुझसे माफ़ी क्यों माँग रही हैं? आपका हक है मुझपर।”

​फोन पर कुछ पल की ऐसी खामोशी छा गई, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। सिर्फ उनकी धीमी सांसों की आवाज़ आ रही थी। फिर वह जो बोलीं, उसने मेरे दिल को चीर कर रख दिया:

​“बेटा… मैं बस यह नहीं चाहती कि मैं तुम पर बोझ बनूँ… तुम्हारी अपनी एक बड़ी ज़िंदगी है… ऑफिस का काम है… बच्चे हैं… घर है… और मैं… अब मैं बूढ़ी हो रही हूँ, मुझसे छोटी-छोटी चीजें भी नहीं होतीं।”

​यह एक वाक्य मेरे कानों से होता हुआ सीधे मेरी आत्मा में उतर गया।

​मेरी आँखों के सामने फ्लैशबैक की तरह बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं। यह वही माँ थीं… जिन्होंने मेरे गिरने से पहले मुझे संभाला था। जो मेरी एक हल्की सी खांसी या बुखार होने पर पूरी-पूरी रात बिना पलक झपकाए मेरे सिरहाने बैठती थीं।

जिन्हें कभी मुझसे अपनी तकलीफ बताने में संकोच नहीं हुआ… और आज, वो सिर्फ एक दो-सेकंड का जार खुलवाने के लिए अपनी ही औलाद के सामने झिझक रही थीं? उन्हें डर था कि कहीं उनका बेटा उन्हें ‘बोझ’ न समझ ले!

​मुझसे अब एक पल भी घर पर नहीं बैठा गया। मैंने लैपटॉप बंद किया, गाड़ी की चाबियाँ उठाईं और फोन पर ही कहा:

“माँ, मैं अभी आपके पास आ रहा हूँ।”

​वह फोन पर मना करती रहीं, “अरे बेटा! रात बहुत हो गई है, सुबह आ जाना, मैं तो ठीक हूँ…” लेकिन मैं उनकी एक सुनने की स्थिति में नहीं था। मैं घर से निकल चुका था।

​जब मैं उनके घर पहुँचा, तो घर का दरवाज़ा खुला था। वह रसोई की छोटी सी लाइट जलाकर डाइनिंग टेबल पर अकेली बैठी थीं। खामोश… थोड़ी उदास… मगर जैसे ही उन्होंने मुझे देखा, उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। वह अपनी उदासी छुपाकर मुस्कुराने लगीं।

​मैं बिना कुछ बोले उनके ठीक पैरों के पास नीचे बैठ गया। उनका हाथ अपने हाथों में लिया—उनके हाथों की चमड़ी अब बूढ़ी और ढीली हो चुकी थी, लेकिन उनकी छुअन में आज भी वही पुराना सुकून था।

​मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा:
“माँ… इस दुनिया में सब मुझसे परेशान हो सकते हैं, लेकिन आप मुझे कभी परेशान नहीं कर सकतीं। कभी भी नहीं। दोबारा मुझसे यह बात मत कहना।”

​वह भर्राई आवाज़ में धीरे से बोलीं:
“मैं बस तुम्हारा कीमती समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी, बेटा…”

​मुझे उस रात एक बहुत बड़ा सबक मिला। मुझे एहसास हुआ कि मैं ज़िंदगी की इस अंधी दौड़ में, पैसे कमाने के चक्कर में, प्रमोशन पाने के चक्कर में सब कुछ तो जीत रहा था… लेकिन दुनिया की सबसे कीमती चीज़—अपनी माँ के साथ का समय हार रहा था।

​मैंने रसोई में जाकर वो जार उठाया। उसे खोलने में मुझे मात्र पाँच सेकंड लगे। वो जार तो खुल गया, लेकिन उसने मेरे भीतर बंद पड़े अहसासों के ढक्कन को भी हमेशा के लिए खोल दिया।

​उसके बाद, हम दोनों रात के दो बजे तक बैठे रहे।

​बचपन की वो पुरानी बातें…

​पापा के समय की यादें…

​मेरी पुरानी शरारतें…

​उनके ज़माने के किस्से…

हम हँसे, हम रोए, और कुछ पल बस खामोश बैठे रहे। वह एक ऐसा सुकून था जो मुझे फाइव-स्टार होटलों या बड़ी-बड़ी पार्टियों में कभी नहीं मिला था।

​जब सुबह होने को आई और मैं वापस अपने घर लौटने के लिए निकला, तो माँ मुझे छोड़ने के लिए मुख्य दरवाज़े तक आईं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन में जब मैं स्कूल बस पकड़ने जाता था, तो वह मुझे तब तक देखती थीं जब तक बस ओझल नहीं हो जाती थी।

​उन्होंने जाते-जाते मेरे सिर पर हाथ फेरा और धीरे से कहा:
“बेटा… रात को आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद… मुझे सच में तुम्हारी बहुत याद आती है…”

​गाड़ी स्टार्ट करते समय मेरी आँखें पूरी तरह नम थीं। उस रात मैंने खुद से, अपनी व्यस्तताओं से और इस भागती हुई दुनिया से एक अटूट वादा किया: मैं अपनी माँ को जीते जी कभी यह महसूस नहीं होने दूँगा कि वह इस दुनिया में अकेली या किसी पर बोझ हैं।

​अब चाहे ऑफिस में कितना भी काम क्यों न हो, मैं हर हफ्ते माँ के पास जाता हूँ। कभी सिर्फ उनके हाथ की चाय पीने, कभी बाज़ार से उनकी पसंद की कोई मिठाई लाने, तो कभी बिना किसी काम के बस उनके पास बैठकर उनकी पुरानी कहानियाँ सुनने।

​और हर बार, जब मैं अपनी गाड़ी से पीछे मुड़कर देखता हूँ… वह आज भी उसी दरवाज़े पर खड़ी होती हैं… कमजोर हाथों से हवा में हाथ हिलाती हुई… मुझे दुआएं देती हुई।

​सच तो यह है दोस्तों…

माता-पिता हमें कभी नहीं भूलते। उनके दिन की शुरुआत हमारी सलामती की दुआ से होती है और रात हमारी तस्वीरों को देखकर। बस हम ही अपनी ‘फेक’ और ‘बिजी’ लाइफस्टाइल में उन्हें पीछे छोड़ देते हैं।

​याद रखिए, जो काम आज आप कर रहे हैं, वह आपके जाने के बाद कोई और भी कर देगा। जो पैसे आप कमा रहे हैं, वो कल भी कमाए जा सकते हैं। लेकिन माता-पिता का वो बुढ़ापा, उनका वो कीमती वक़्त और उनका साया एक बार चला गया… तो दुनिया की पूरी दौलत देकर भी आप उन्हें एक सेकंड के लिए वापस नहीं ला सकते।

****​आपने आख़िरी बार अपनी माँ या पापा के पास बैठकर, उनका हाथ थामकर, सुकून से बिना फोन छुए कब बात की थी?
​अगर याद नहीं आ रहा… तो यह पोस्ट बंद कीजिए, उन्हें अभी फोन मिलाइए या उनके पास जाकर बैठिए। क्योंकि जार तो कोई भी खोल देगा, लेकिन उन्हें सिर्फ आपका ‘वक़्त’ चाहिए। ❤️

अंत में मेरा एक ही सवाल – आखिर क्यों हम हमारे जन्मदाता मातापिता से अलग रहने लगे जाते हैं और फिर कभी कभी अपने जज्बातों को प्रकट करने उनके पास आते हैं? बहुत से लोग आते ही नहीं इतनी दूर चले जाते हैं कभी न आने के लिए…क्यों??₹

कमेंट में अपनी राय अवश्य लिखें और अपने बहुमूल्य सुझाव देते रहें।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button