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गुरु पूर्णिमा : जीवन रूपांतरण का अवसर : दीक्षा कहाँ से लें, के

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*गुरु पूर्णिमा : जीवन रूपांतरण का अवसर*

गुरु पूर्णिमा महोत्सव सनातन धर्म में गुरु के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का सबसे बड़ा पर्व है। आषाढ़ पूर्णिमा को ही महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन गुरु पूजन और नाम दीक्षा (मंत्र दीक्षा) का विशेष महत्व है।

यहाँ पूजन विधि और नाम दीक्षा की पूरी प्रक्रिया और महत्व की विस्तृत जानकारी दी गई है:

*1. गुरु पूर्णिमा पूजन विधि*
यदि आप अपने गुरु के आश्रम या उनके सम्मुख जा रहे हैं, या घर पर ही मानसिक पूजन कर रहे हैं, तो इस विधि का पालन करें:

* प्रातः काल स्नान व संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो पीले या सफेद) धारण करें। व्रत या पूजन का संकल्प लें।
* व्यास पीठ/गुरु स्थान की स्थापना: उत्तर या पूर्व दिशा में एक चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं। उस पर महर्षि वेदव्यास जी, भगवान शिव या अपने गुरुदेव की तस्वीर या चरण पादुका स्थापित करें।
* पाद्य पूजा (चरण प्रक्षालन): यदि गुरु साक्षात उपस्थित हैं, तो उनके चरणों को जल और दूध से धोएं। घर पर तस्वीर होने पर प्रतीकात्मक रूप से जल छिड़कें।
* तिलक और अक्षत: गुरुदेव की प्रतिमा या उनके मस्तक पर चंदन, केसर या कुमकुम का तिलक लगाएं और अक्षत (चावल) अर्पित करें।
* वस्त्र और पुष्प अर्पण: गुरुदेव को पीला वस्त्र या शॉल ओढ़ाएं। उन्हें फूलों का हार या पुष्प अर्पित करें।
* भोग और आरती: फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाएं। इसके बाद धूप-दीप जलाकर गुरुदेव की आरती करें और उनका आशीर्वाद लें।

*2. नाम दीक्षा (मंत्र दीक्षा) क्या है?*
नाम दीक्षा वह आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें एक योग्य गुरु अपने शिष्य को एक विशेष मंत्र या भगवान का नाम प्रदान करते हैं। इसे “गुरु मंत्र” भी कहा जाता है।

*नाम दीक्षा का महत्व:*

* आध्यात्मिक जन्म: माना जाता है कि दीक्षा के बाद शिष्य का दूसरा (आध्यात्मिक) जन्म होता है।
* कर्मों का क्षय: गुरु शिष्य के पापों और मानसिक विकारों को दूर करने का दायित्व लेते हैं।
* ऊर्जा का स्थानांतरण: मंत्र केवल शब्द नहीं होता, बल्कि उसमें गुरु की तपस्या और आध्यात्मिक ऊर्जा समाहित होती है।

*नाम दीक्षा की प्रक्रिया (गुरु पूर्णिमा पर):*

1. योग्यता और भाव: इस दिन दीक्षा लेने के लिए मन में गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास होना अनिवार्य है।
2. आश्रम में पंजीकरण: यदि आप किसी संप्रदाय या गुरु से जुड़े हैं, तो पूर्णिमा से पहले ही दीक्षा के लिए अपना नाम पंजीकृत (रजिस्टर) कराना होता है क्योंकि इस दिन भारी भीड़ होती है। पंजीयन के लिए निर्धारित प्रपत्र में अपनी जानकारी देते हुए दीक्षा का संकल्प लें।
3. दीक्षा संस्कार: गुरु शिष्य के कान में गुप्त रूप से मंत्र फूंकते हैं। इसे श्रवण दीक्षा कहा जाता है। कुछ गुरु नाम दान या माला देकर भी दीक्षा देते हैं।
4. गुरु दक्षिणा: दीक्षा पूरी होने पर शिष्य अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को धन, वस्त्र, फल या अपनी बुराइयों को छोड़ने का संकल्प दक्षिणा के रूप में देता है।

*3. दीक्षा के बाद पालन करने योग्य नियम*
यदि आप इस गुरु पूर्णिमा पर नाम दीक्षा ले रहे हैं, तो इन नियमों का आजीवन पालन करना होता है:

* मंत्र की गोपनीयता: गुरु द्वारा दिए गए मंत्र को हमेशा गुप्त रखना चाहिए। इसे किसी मित्र, परिवार के सदस्य या अन्य व्यक्ति को न बताएं।
* नियमित जप: प्रतिदिन सुबह और शाम (या गुरु के निर्देशानुसार) माला से मंत्र का जप अवश्य करें।
* सात्विक जीवन: दीक्षा के बाद तामसिक भोजन (मांस, मदिरा आदि) से पूरी तरह दूर रहना चाहिए और आचरण को शुद्ध रखना चाहिए।

*दीक्षा कहां से कैसे मिले?*

ऋषिश्री वरदानंद जी महाराज – स्वामी सत्यानंद जी महाराज और जगतगुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के प्रिय आत्म रूप शिष्य और नव अध्यात्म विज्ञान के प्रणेता हैं। ऋषिश्री एक ऐसे संत सतगुरु हैं जिन्होंने गृहस्थ जीवन में रहते हुए सांसारिक जीवन मे भौतिक उपलब्धियों को प्राप्त करते हुए आत्मसाक्षात्कार के द्वारा आध्यात्मिक जीवन की उन ऊंचाइयों की छुआ है जो बड़ी तप तपस्याओं से मिलती हैं। उनका जीवन आश्चर्य चकित करने वाला है कि किस तरह एक 25 वर्षों का कॉर्पोरेट जीवन और मुम्बई यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर पद पर रहने वाला और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना में भारत के प्रथम स्टॉक ब्रोकर के रूप में कम्प्यूटर आधारित ट्रेड करने वाला व्यक्ति उच्चपदेन सांसारिक उत्तरदायित्वों को निभाते हुए आयुर्ज्योतिषाचार्य, प्रबंध सलाहकार, मनोवैज्ञानिक और स्पिरिचुअल ऑडिटर के रूप में समाज में वंदनीय और सनातन धर्म के मूल्यों को पुनर्स्थापित करने और भारत को सुपरपॉवर एवं विश्वगुरू बनाने की दिशा में सफलतापूर्वक लोगों का मार्गदर्शन और समाज सुधार के कार्य में स्वस्थ जीवन की ऊर्जा के साथ दिन रात 18 से 20 घण्टे कर्मशील है।

ऋषिश्री डॉ वरदानन्द जी महाराज द्वारा प्रतिपादित दीक्षा आत्मिक पुनर्जन्म का ऐसा सिद्धांत और सरल विधान है जिसमें व्यक्ति अपने सांसारिक जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए परमात्मा द्वारा प्रदत सभी सुखों का सद भोग करते हुए आध्यात्मिक पथ पर साधना कर मुक्त जीवन की महक (मोक्ष) प्राप्त कर सकते हैं। ऋषिश्री ने इसे नव-अध्यात्म विज्ञान की संज्ञा दी है जिसे उन्होंने 30 से अधिक वर्षों के अनुसंधान और अनुभूति से प्रतिपादित किया है।

इसी के अंतर्गत, उन्होंने ऐसे परमात्मा के शक्तिस्थलों की स्थापना का संकल्प और परिकल्पना की जहाँ आकर आम मनुष्य भी ऊर्जा स्रोत से सहज रूप से जुड़कर अपने को ऊर्जावान, उत्साहित और उन्नत कर सकता है। ये रामशक्तिपीठ विश्वभर में 108 स्थानों पर प्रतिष्ठित किये जायेंगे जो प्रत्येक परस्पर प्रतिकृति होंगे। इसका शुभारंभ विश्वप्रथम रामशक्तिपीठ अत्यंत गोपनीय ढंग से होने जा रहा है जिसमें महाराज जी द्वारा दीक्षित शिष्यों और साधकों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करके दायित्व दिये जायेंगे।

नव अध्यात्म विज्ञान और विश्व प्रथम रामशक्ति पीठ की स्थापना का यह संकल्प अत्यंत दिव्य और युगांतरकारी है। यह विधान आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्राचीन वैदिक साधना पद्धति का एक अभूतपूर्व समन्वय है।

* *नव अध्यात्म विज्ञान एवं रामशक्ति पीठ*

*१. प्रस्तावना एवं उद्देश्य (The Core Vision)*
“नव अध्यात्म विज्ञान” अंधविश्वास से परे, अध्यात्म को एक प्रामाणिक आंतरिक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का अभियान है। विश्वप्रथम रामशक्ति पीठ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) का वह केंद्र होगा जहाँ साधक अपनी सुप्त चेतना को जाग्रत कर सकेंगे। इसका उद्देश्य मनुष्य का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूपांतरण करना है।

*२. त्रिविध दीक्षा मार्ग (The Three-Tier Initiation Path)*
आश्रम द्वारा मानव कल्याण और आत्म-उत्थान के लिए क्रमिक रूप से तीन श्रेणियों में दीक्षा प्रदान की जाएगी:

* प्रथम चरण – नाम दीक्षा (The Foundation): सर्वशक्तिमान परमात्मा के नाम जप की दीक्षा। यह चंचल मन को स्थिर करने, अंतःकरण की शुद्धि करने और परमात्मा से सीधा संबंध जोड़ने का प्राथमिक आधार है।
* द्वितीय चरण – मंत्र दीक्षा (The Personal Alignment): साधक के ‘ईष्ट देव’ के विशिष्ट मंत्र की दीक्षा। यह दीक्षा साधक की व्यक्तिगत ऊर्जा, प्रकृति और कुंडली के अनुसार उसके ईष्ट की शक्ति को जाग्रत करने के लिए दी जाएगी।
* तृतीय चरण – चक्र दीक्षा (The Ultimate Evolution): नाम और मंत्र दीक्षा में परिपक्व हो चुके उन्नत साधकों के लिए। यह साधक के भीतर स्थित सप्त चक्रों (मूलाधार से सहस्रार) के जागरण, भेदन और ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन (उत्थान) की परम वैज्ञानिक पद्धति है।

प्रथम दो विधियां समानांतर रूप से लागू होगी और पात्रता के अनुसार दोनों में से किसी एक विधि द्वारा दीक्षा दी जाएगी। यह दीक्षा व्यक्तिश प्रत्यक्षतः अथवा ऑनलाइन दोनों पद्धतियों में से किसी भी एक विधि से गुरुजी की आज्ञानुसार दी जाएगी।

तीसरी विधि की दीक्षा उक्त दोनों विधियों में दक्षता के पश्चात केवल प्रत्यक्षतः ही महाराज जी द्वारा पंचदिवसीय/सप्तदिवसीय साधना सत्संग के दौरान ही दी जाएगी।

* आश्रम नियमावली एवं दीक्षा विधान (Rules & Protocols)*

*भाग क: दीक्षा हेतु पात्रता* (Eligibility Criteria)

1. क्रमबद्धता का नियम: चक्र दीक्षा सीधे किसी नए साधक को नहीं दी जाएगी। साधक को पहले नाम अथवा मंत्र दीक्षा के मार्ग से गुजरना होगा।
2. मानसिक व शारीरिक तत्परता: चक्र दीक्षा के साधक का मानसिक रूप से सुदृढ़ होना अनिवार्य है, क्योंकि चक्र जागरण के समय तीव्र ऊर्जा का प्रवाह होता है।
3. संकल्प पत्र: दीक्षा से पूर्व प्रत्येक साधक को आश्रम के नियमों के पालन का लिखित संकल्प लेना होगा।

*भाग ख: दीक्षा के उपरांत पालन योग्य नियम (Code of Conduct)*

1. दैनिक साधना: दीक्षा प्राप्त साधक को प्रतिदिन नियत समय पर (प्रातः काल या संध्या काल) अपने स्तर की साधना (नाम/मंत्र/चक्र ध्यान) अनिवार्य रूप से करनी होगी।
2. गोपनीयता का सिद्धांत: मंत्र दीक्षा और विशेषकर चक्र दीक्षा की गुप्त विधियों, अनुभवों और क्रियाओं को किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट करना पूर्णतः वर्जित होगा। यह ऊर्जा के ह्रास को रोकता है।
3. सात्विक जीवन शैली: दीक्षा धारक साधकों के लिए तामसिक आहार (मांस, मदिरा, नशा) और अमर्यादित आचरण का त्याग अनिवार्य है।
4. सेवा और समर्पण: रामशक्ति पीठ के निर्माण और नव अध्यात्म विज्ञान के प्रचार-प्रसार में अपनी क्षमता अनुसार (तन, मन, धन या समय से) सहयोग करना साधक का नैतिक कर्त्तव्य होगा।

दीक्षा हेतु पंजीकरण का फॉर्म इस लिंक से डाउनलोड करके या क्लिक करके भर सकते हैं। कोई कठिनाई हो तो आश्रम के कार्यालय अधीक्षक से 7303730322 पर संपर्क करके सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

https://forms.gle/aYQgtPsqLypbbQBJ9

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श्री सतगुरुदेव नमः

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