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मूर्ख नेता के मूर्ख चमचे

जागो और जगाओ भारत – यूथ को ना बर्गलाओ भारत

कहते हैं कि एक नेता की सोच का स्तर उसकी सबसे करीबी जनता तय करती है। लेकिन जब मंच पर ही सामान्य ज्ञान का ‘दिवालियापन’ दिखने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि पूरा इकोसिस्टम किस दिशा में जा रहा है।

राहुल गांधी जब भी सरकार को घेरने की कोई ‘टोह’ या रणनीति बनाते हैं, उनका एकमात्र उद्देश्य युवाओं की भावनाओं को भड़काना और उन्हें मुख्यधारा से भटकाना होता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिन ‘किराए के दिग्गजों’ और युवाओं को वे इस काम के लिए आगे करते हैं, उनका कॉमन सेंस खुद उनके नेता की ही तरह ‘शून्य’ साबित होता है।

नतीजा? बने-बनाए खेल की पूरी तरह मट्टी पलीत हो जाती है।
इन लोगों में बुद्धिजीवी बनने की होड़ का एक अद्भुत नजारा दिखता है। राहुल गांधी ने पूछा कि आईएएस (IAS) बनने की संभावना क्या है? सामने से जवाब आया 100 में से 1, यानी 0.01%।”
इस एक पंक्ति ने देश के सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा की वास्तविकता और गणित की बुनियादी समझ, दोनों का एक साथ मजाक बना दिया जो तथ्यों से कोसों दूर है असलियत यह है कि पिछले डेढ़-दो दशकों में लगभग 1500 में से एक अभ्यर्थी का चयन होता आया है, और वर्तमान प्रतिस्पर्धा के दौर में यह अनुपात 3000 में से एक तक पहुँच चुका है। 100 में से 1 का अनुमान लगाना ही जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे होने का प्रमाण है।
और प्रतिशत का नया अविष्कार देखिए इन स्वघोषित विचारकों को यह तक नहीं पता कि 1/100 का मतलब 1\% होता है, न कि 0.01\%। गणित के मामले में जहाँ समझ बिल्कुल सिफ़र (Zero) है, वहीं आत्मविश्वास का पैमाना पूरे nil/सन्नाटा पर तैर रहा है।
दूसरे वीडियो में एक और ‘महान तर्क’ सामने आता है। मंच पर माइक थामे एक अन्य युवती अत्यंत गंभीरता से सरकार पर सवाल दागती हैं
“UPSC का पेपर बहुत लंबा और कठिन होता है। 15 लाख लोग परीक्षा देते हैं और सिर्फ 1,000 चुने जाते हैं। सरकार बताए कि बाकी बचे 14 लाख 99 हजार युवाओं के लिए ‘प्लान-बी’ क्या है?”
इस अद्भुत ‘आईक्यू लेवल’ पर तो बस यही कहा जा सकता है
कि देश में 20 लाख लोग लॉटरी का टिकट खरीदते हैं और इनाम सिर्फ एक को मिलता है, तो बाकी बचे 19,99,999 लोगों के लिए मोदी सरकार क्या कर रही है? उनके टिकट के पैसों का ‘प्लान-बी’ कहाँ है?

शायद इन नौजवानों को लगता है कि पहले के गरीबी हटाओ जुमला कोंग्रेसी सरकारों के जमाने में जो लोग आईएएस में फेल होते थे, उन्हें सरकार सांत्वना पुरस्कार के रूप में सीधे डिप्टी कलेक्टर बना देती थी! और जो वहां भी रह जाते थे, उन्हें नायब तहसीलदार की कुर्सी सौंप दी जाती थी। ठीक वैसे ही, जैसे प्रोफेसर न बन पाने वालों को रीडर और रीडर न बन पाने वालों को सीधे लेक्चरर की मानद उपाधि मिल जाती रही होगी!

इन ‘बुद्धिजीवियों’ को कौन समझाए कि प्रतियोगी परीक्षा का बुनियादी नियम ही यही है कि उसे कठिन होना चाहिए। यह कोई ‘सबको पास करने’ वाला स्कूल का एग्जाम नहीं है। यहाँ ‘अच्छे’ का नहीं, बल्कि ‘सर्वोत्तम’ (Best among the best) का चुनाव होता है।
#गजब का इकोसिस्टम है
जो लोग प्रतिशत का साधारण सा नियम नहीं जानते और प्रतियोगिता का मूल सिद्धांत नहीं समझते, वे देश की नीतियां तय करने और सरकार को घेरने का स्वांग रच रहे हैं। जब भड़काने की राजनीति करने वाले के पास खुद कोई ठोस विजन न हो, तो उसके मंच से ऐसे ही चुटकुलों का जन्म होता है। जैसा खोखला नेतृत्व, वैसी ही उसकी सतही ऑडियंस!

राजस्थान के कोटा में छात्रों के साथ संवाद के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने देश की शिक्षा और भर्ती व्यवस्था पर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि हजारों छात्र कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन बहुत कम छात्रों को IAS, IIT या मेडिकल जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में जगह मिल पाती है।

राहुल गांधी ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 3,000 छात्रों में से केवल एक IAS बनता है, लगभग 30 छात्रों का IIT में चयन होता है और करीब 180 छात्र डॉक्टर बन पाते हैं।

उन्होंने दावा किया कि हिंदुस्तान में ‘सलेक्शन सिस्टम’ नहीं, ‘रिजेक्शन सिस्टम’ है.

राहुल गाँधी को नई script दी गयी है इस बार….. लेकिन कहते हैं… कि script कितनी ही अच्छी हो… अगर एक्टर बेकार है… उसका execution बेकार है… तो गुड़ गोबर हो जाता है.

यह सिलेक्शन सिस्टम पूरी दुनिया में है…. यह दुनिया का आधारभूत सिद्धांत है…. जो best है, वही टिकेगा…. बाकि सब Reject.

Survival of the fittest का सिद्धांत भी इसी पर Based है.

अरबों शुक्राणुओ की दौड़ में कोई एक ही जीत कर जीवन पाता है… बाकि सब Reject ही होते हैं.

ऑफिस में Job Opening होती है…. पिछले लगभग 14-15 साल से मैं इंटरव्यू Panel का हिस्सा रहता आया हूँ…..1 position के लिए कभी कभी 50-60 लोग भी आते हैं… एक Select होता है… बाकि सब Reject होते हैं….. कोई नई बात है क्या?? सब जगह होता है.

इंटरव्यू के लिए आना मात्र Job Offer की गारंटी नहीं होती.

राहुल गाँधी की script के हिसाब से तो हर शुक्राणु को जीवन देना चाहिए… हर इंटरव्यू देने वाले को Job Offer दे देना चाहिए.

अन्यथा मोदी जी की गलती मानी जायेगी.

सवाल है… कि क्या यह संभव है?

सरकार को छोड़िये, institute को छोड़िये, कंपनी छोड़िये… क्या Personal लेवल पर हमारे लिए यह संभव है?

हम मंडी जाते हैं… वहां हजारों दुकाने होती हैं… लेकिन हम सब्जी 2-3 से लेते हैं….. क्या यह बाकि सब्जी वालों का Rejection नहीं है? बिलकुल है.

हम मिठाई लेने जाते हैं…. मार्केट में 10 हलवाई बैठे हैं….. लेकिन मुझे तो कल्लू हलवाई से लड्डू लेने हैं… क्या यह अन्य 9 हलवाइयों का Rejection नहीं है? बिलकुल है.

यही सिस्टम है… यही प्रकृति का नियम है.

IIT के Entrance में 2 लाख बच्चे बैठते हैं….. लेकिन सीट मान लीजिये 2,000 ही हैं….. तो बाकि के 1,98,000 Rejected ही माने जाएंगे.

मात्र Appear होना स्थान पाने की गारंटी नहीं हो सकती.

यह कोई राकेट Science नहीं है… और यह सब जगह है.

राहुल गाँधी इस point पर बच्चों को भड़का कर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं… तो बेशक़ करें… लेकिन यह निरी मूर्खता है.

वैसे सवाल तो राहुल गाँधी से भी बनता है

भारत में करोड़ों कांग्रेस समर्थक हैं, कांग्रेस के हजारों नेता हैं…. लेकिन कांग्रेस का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार एक ही रहता है…. क्यों भाई?

यह Rejection सिस्टम नहीं है क्या? और यहाँ तो किसी को appear होने का हक भी नहीं

वंदे मातरम

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