आज की कहानीऋषिश्री सन्देशवरद वाणी

अदृश्य गुरु की भेंट : तीन पत्थर सफल जीवन म

कहानी बड़ी सुहानी

—”समय की पोटली और तीन पत्थर” – अदृश्य गुरु की भेंट

​बहुत समय पहले की बात है। एक नदी के किनारे एक छोटा सा आश्रम था, जहाँ एक युवा साधक रहता था। वह दिन-रात ईश्वर की भक्ति और साधना में लीन रहता था, लेकिन उसके मन में हमेशा एक बेचैनी रहती थी कि उसे आत्मज्ञान कब प्राप्त होगा।

एक शाम, जब वह नदी के किनारे ध्यान लगा रहा था, तो पानी की लहरों के बीच से एक वृद्ध महात्मा प्रकट हुए। उनके चेहरे पर एक असीम तेज था। साधक ने तुरंत उनके पैर छुए और अपनी बेचैनी का कारण बताया।

महात्मा मुस्कुराए और उन्होंने साधक को एक छोटी सी रेशमी पोटली दी। महात्मा ने कहा, “पुत्र, इस पोटली में तीन दिव्य पत्थर हैं। ये तुम्हारी हर उलझन को सुलझा देंगे। लेकिन इन्हें खोलने का एक नियम है। तुम हर एक पत्थर को जीवन के एक विशेष मोड़ पर ही खोल सकते हो। पहला आज रात, दूसरा तब जब तुम जीवन के सबसे कठिन संकट में हो, और तीसरा तब जब तुम्हें लगे कि तुमने सब कुछ पा लिया है।” इतना कहकर महात्मा अंतर्ध्यान हो गए।*

​पहला पत्थर: ‘वर्तमान की शक्ति’
साधक उत्सुकता से अपनी कुटिया में लौटा। नियम के अनुसार, उसने रात को पहली पोटली खोली। उसमें से एक चमकता हुआ नीले रंग का पत्थर निकला, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था: “अपेक्षा”।
जैसे ही उसने उस पत्थर को छुआ, उसके मन में एक विचार कौंधा—वह साधना इसलिए नहीं कर रहा था कि उसे ईश्वर से प्रेम था, बल्कि इसलिए कर रहा था क्योंकि उसे ‘आत्मज्ञान’ पाने की अपेक्षा (इच्छा) थी। वह भविष्य की चिंता में आज के आनंद को खो रहा था। साधक को अपनी भूल समझ में आ गई। उसने भविष्य की चिंता छोड़कर वर्तमान में जीना और निस्वार्थ भाव से साधना करना शुरू कर दिया। उसका मन शांत हो गया।

​दूसरा पत्थर: ‘परिवर्तन का नियम’
कई वर्ष बीत गए। एक समय ऐसा आया जब उस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। नदी सूख गई, आश्रम के पेड़-पौधे कुमकुम भाग्य की तरह मुरझा गए और साधक को अन्न के एक-एक दाने के लिए तरसना पड़ा। उसके साथी साधक उसे छोड़कर चले गए। वह पूरी तरह अकेला, भूखा और निराश हो चुका था। उसे लगा कि अब उसके प्राण निकल जाएंगे।
​तभी उसे महात्मा की बात याद आई। उसने कांपते हाथों से दूसरी पोटली खोली। उसमें से एक गहरे लाल रंग का पत्थर निकला, जिस पर लिखा था: “यह भी बीत जाएगा”।
इन चार शब्दों को पढ़ते ही साधक के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। उसे समझ आ गया कि दुख हो या सुख, समय कभी एक जैसा नहीं रहता। प्रकृति का नियम ही परिवर्तन है। उसने हिम्मत नहीं हारी, धैर्य बनाए रखा और कुछ ही महीनों में बारिश हुई, प्रकृति फिर से हरी-भरी हो गई और उसका संकट टल गया।

तीसरा पत्थर: ‘अहंकार का विसर्जन’
इस कठिन परीक्षा से गुजरने के बाद साधक अत्यंत ज्ञानी और सिद्ध पुरुष बन गया। दूर-दूर से लोग उसके दर्शन करने आने लगे। राजा-महाराजा उसके चरणों में शीश झुकाते थे। उसे लगने लगा कि उसने जीवन का परम लक्ष्य पा लिया है और वह इस संसार का सबसे सिद्ध व्यक्ति है।
तभी उसे महात्मा का तीसरा नियम याद आया—”जब तुम्हें लगे कि तुमने सब कुछ पा लिया है।”
उसने अंतिम पोटली खोली। उसमें से एक साधारण, बिना चमक वाला सफेद पत्थर निकला। उस पर कुछ लिखा नहीं था, बल्कि वह पत्थर बिल्कुल पारदर्शी था, एक आईने की तरह। जब साधक ने उसमें ध्यान से देखा, तो उसे अपनी छवि के पीछे अनंत ब्रह्मांड दिखाई दिया, जिसके सामने वह स्वयं एक छोटे से कण के बराबर भी नहीं था।
वह तुरंत समझ गया कि जिसे वह अपनी ‘सफलता’ और ‘सिद्धि’ समझ रहा था, वह तो सिर्फ उसका अहंकार था। इस अनंत सृष्टि में वह कुछ भी नहीं है। उसका अहंकार तुरंत पिघल गया और वह पूरी तरह से सरल और विनम्र हो गया।

​कहानी की सीख
जीवन का सार: यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन को सही तरीके से जीने के लिए तीन सूत्र अनिवार्य हैं:
1. भविष्य की अपेक्षाओं को छोड़कर वर्तमान में जीना।
2. कठिन समय में यह याद रखना कि “यह समय भी बीत जाएगा”।
3. सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी अपने अहंकार को शून्य रखना।
परम गुरु जय जय राम

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