अहिल्या की तरह आज की नारी का उद्धार क्यों नहीं?

खारघर नवी मुंबई में सद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी के श्रीमुख से मुखरित श्रीराम कथा के अहिल्या उद्धार के प्रसंग में आज की नारी के व्यवहार, सतीत्व और पुनरुत्थान का वर्णन हुआ, उसी से यह लेख प्रतिपादित हुआ, पढिये होपधारा लाइब्रेरी में
बचपन में रामलीला के मंचन के दौरान अनेक प्रसंगों में से एक अहिल्या उद्धार का प्रसंग सदैव रहस्य बना रहा क्योंकि किसी नारी का पत्थर बन जाना और भगवान राम जी के छूने मात्र से पुनः नारी बन जाना एक पहेली ही रहा।
आज जानते हैं इस पहेली का रहस्य और साथ में आज की नारी की इस कहानी के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता…
वस्तुतः अहिल्या की कहानी – पतन, एकांत और पुनर्जागरण की कहानी है।
ऋषि वाल्मीकि की रामायण में अहिल्या और गौतम ऋषि की कथा सिर्फ पौराणिक नहीं है — यह हर युग की सच्चाई है।
जब इंद्र ने अहिल्या को मोहित किया, अहिल्या जानती थीं कि वह इंद्र हैं, फिर भी उन्होंने क्षणिक आकर्षण में अपनी मर्यादा तोड़ी। गौतम ऋषि लौटे, सत्य जानकर उन्होंने इंद्र को शाप दिया — और अहिल्या को भी, कि वह अकेली रहेंगी, निर्जीव-सी, बिना भोजन, बिना संग, बिना संवाद — एक पत्थर की तरह।
लेकिन “पत्थर बन जाना” का अर्थ यह नहीं था कि वह सचमुच शिला बन गईं।
इसका अर्थ था — जीवित होकर भी भीतर से मृत हो जाना।
वह वही स्थिति थी जो आज भी हम देखते हैं — जब कोई गलती करता है, समाज त्याग देता है, और व्यक्ति अवसाद, अपराधबोध और अकेलेपन में डूब जाता है।
सालों बाद जब भगवान श्रीराम आए और अहिल्या के चरण छुए, तो उन्होंने उनके अतिथि सत्कार को स्वीकार किया — उसी क्षण अहिल्या फिर से जीवंत हो उठीं।
उनमें फिर से प्राण, गरिमा और अर्थ लौट आया।
यह कथा सिर्फ अहिल्या की नहीं, यह हर युग के पुरुषों और स्त्रियों की कहानी है —
जहाँ कोई गलती करता है, समाज त्याग देता है,
और जब कोई राम-सा व्यक्ति उसे स्वीकार कर लेता है —
वह फिर से जीवित हो उठता है।
आज भी हमारे चारों ओर कई अहिल्याएँ हैं —
कभी वह एक महिला होती है जो अपने निर्णयों पर पछताती है,
कभी एक पुरुष जो अपराधबोध में जी रहा है,
कभी कोई युवक जो समाज से अस्वीकृत महसूस करता है।
अगर हम किसी की स्वीकृति बन जाएँ —
तो शायद कोई और अहिल्या फिर से जीवन पा ले।
✨ यह कहानी सिखाती है कि हर पत्थर में जीवन की संभावना है —
बस कोई राम चाहिए जो छूकर उसे फिर से जगा दे।
परन्तु आज अहम प्रश्न यह है कि क्यों कोई अहिल्या बन रही है, क्यों आज की नारी अपनी गरिमा से पतित होकर अहिल्या जैसा दुष्कर्म कर रही है, और इससे भी बड़ा यक्ष प्रश्न है कि आज की नारी को अहिल्या की तरह कोई अपराध बोध या पत्थर की तरह स्तब्ध होने की ग्लानि भी नहीं है तो किसी राम को आने की क्या आवश्यकता है?
इसलिए आज की नारी का पतन तो हो रहा है, परन्तु उद्धार नहीं हो रहा।
ॐ नमो राघवाय, जय जय राम
लेखक, सम्पादक
ऋषिश्री सौरभ वरदानंद

