ऐसा महात्मा था गांधी !
3 साल दक्षिण अफ्रीका में अकेले रहने के बाद गांधी अपना परिवार भी लेते आये। परिवार में पत्नी कस्तूरबा, बेटे हरिलाल और मणिलाल तथा भांजा गोकुलदास थे।
उन दिनों गांधी डरबन में बीचग्रोव नामक कोठी में रहते थे। समुद्र के किनारे इस कोठी में कई कमरे थे, जिसमें गांधी का कार्यालय भी था, कुछ कमरों में उनके कर्मचारी भी रहते थे।
उन दिनों घरों में आज की तरह शयनकक्ष से सटे बाथरूम नहीं होते थे। रात में दूर तक जाकर कौन लघुशंका करे, इससे बचने के लिए कमरों में एक बरतन चैम्बर-पॉट रखा जाता था जिसमें मूत्र विसर्जन किया जाता। सुबह उसकी सफाई हो जाती। यह सामान्य बात थी।
गांधी सफाई पसन्द थे, लोगों को एक उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने मानव-मूत्र से भरे बरतनों को साफ करने का पवित्र कार्य अपने जिम्मे लिया था। न केवल अपने परिवार का, बल्कि उनके बंगले में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य का।
गांधी चाहते थे की उनकी पत्नी भी इस कार्य में उनका हाथ बटाये, सच भी था आख़िर अर्धांगनी थी वो…
कस्तूरबा जैन परिवार में पली-बढ़ी महिला थी। दूसरों का पेशाब साफ को तैयार ना थीं !
हम दूसरों का मल-मूत्र क्यों उठायें? जो यह करते हैं, वे वंदनीय हो सकते हैं, पर किसी से जबरदस्ती यह करवाना वंदनीय तो नहीं हो सकता न, बल्कि अमानुषिक अवश्य होगा। गांधी खुद उठाते, पर नहीं, उन्हें तो अपनी पत्नी से भी यही काम करवाना था।
बहुत दिनों की खींचतान के बाद अंततः एक दिन बवाल हो ही गया।
गांधी गुस्से में बोले, “तुमने विंसेंट लॉरेंस का कमरा क्यों नहीं साफ किया?” ( विंसेंट भारतीय मूल का धर्मांतरित ईसाई था।)
कस्तूरबा ने भी तुनक कर जवाब दिया, “क्या साफ नहीं किया? उसका वह बरतन? वह मैं क्यों साफ करूँ? तुम ही तो कहते हो कि सबको अपना काम खुद करना चाहिए?”
“वह हमारा मेहमान है?”
“मेहमान तीन-चार दिन का होता है। वह मेहमान नहीं, यहीं रहता है स्थायी रूप से।”
“देखो, यह पवित्र कार्य है। तुम्हे करना ही चाहिए।”
“होगा पवित्र कार्य। मैं यह पवित्र कार्य अपने परिवार तक सीमित रखूंगी। तुम्हारा, बच्चों का तो करती ही हूँ न। बाकियों का मैं क्यों करूँ?”
गांधी को गुस्सा आ गया, चीखते हुए बोले, “मेरे घर में रहना है तो मेरे व्रत का पालन करना ही होगा।”
बच्चों ने अपने मां-बाप को ऐसे लड़ते कभी नहीं देखा था। सहमे हुए हरिलाल ने कहा, “बापू, यह काम मैं कर दिया करूँगा।”
यह बोल वह जोसेफ के कमरे की ओर बढ़ा, पर गांधी ने उसे रोकते हुए कहा, “तुम नहीं, यह तो तुम्हारी माँ को ही करना होगा!”
कस्तूरबा भी अपना धैर्य खो चुकी थी, “मैंने कह दिया न, चाहे कुछ हो, मैं दूसरों का पेशाब-पाखाना साफ नहीं करूंगी।”
गांधी ने अपना आपा खो दिया। अहिंसावादी गांधी ने बढ़कर कस्तूरबा का हाथ पकड़ा और उन्हें घसीटते हुए दरवाजे तक ले आये।
वे उन्हें धक्के मारकर घर से बाहर निकाल देने वाले थे कि कस्तूरबा न जाने हँसते हुए, या रोते हुए बोल पड़ी,
“रुक जाओ मोहन। आज तुमने मुझे इस घर से निकाल दिया तो मैं कभी वापस नहीं आऊंगी।
और जो तुम संदेश देना चाहते हो ना इन गरीब गिरमिटियों को, तो तुम अपनी पत्नी से मारपीट कर उसे घर से निकाल कर कोई अच्छा उदाहरण नहीं पेश कर रहे।
यहाँ के गोरे तो कहते ही हैं कि भारतीय गंदे और घिनौने होते हैं, अपनी पत्नियों को पीटते हैं। जब तुम जैसा संभ्रांत बैरिस्टर भी यही करेगा तो उनका यह आरोप सिद्ध हो जाएगा।”
गांधी को लगा कि उनके मुँह पर किसी ने कस कर तमाचा जड़ दिया है। उन्होंने कस्तूरबा को छोड़ा और मुँह छिपाए घर से निकल गए।
कुछ देर बाद वापस आए और उन्होंने कस्तूरबा से दिल से माफी मांगी।
फिर,
फिर क्या, कस्तूरबा को वे बरतन तो साफ करने ही पड़े।
#गांधी_के_अनकहे_क़िस्से
ऐसा ही एक और प्रसंग जो गाँधी की असलियत सिद्ध करता है



