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स्वदेशी कंपनियों का विरोध क्यों? अडानी अंबानी चोर कैसे??

* स्वदेशी कंपनियों का विरोध क्यों?*

• *जियो* के आने से पहले दूरसंचार और इंटरनेट सेवाओं की कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं पर काफी बोझ था। जियो के प्रवेश के बाद इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा तेज हुई और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिले।

• *रिलायंस खुदरा* के विस्तार से अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी विदेशी कंपनियों को भारतीय बाजार में मजबूत प्रतिस्पर्धा मिली।

• *अडानी समूह* के विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार से विदेशी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

• *पतंजलि* ने दैनिक उपयोग की वस्तुओं के क्षेत्र में हिंदुस्तान यूनिलीवर और कोलगेट जैसी बड़ी कंपनियों को चुनौती दी।

• *प्रश्न यह है कि यदि भारतीय कंपनी प्रतिस्पर्धा करती है, तो उसका विरोध क्यों?*

• कोई कंपनी महँगी है या उसका उत्पाद पसंद नहीं है, तो उपभोक्ता के पास दूसरी कंपनी का उत्पाद खरीदने का विकल्प है। किसी को जबरन खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाता।

*विदेशी कंपनियों के लिए अलग नियम क्यों?*

• कोका-कोला, पेप्सी, अमेज़न, डीएचएल, फेडएक्स, होंडा, हुंडई तथा अनेक चीनी और कोरियाई कंपनियों ने भारत में बड़े बाजार बनाए।

• *विदेशी कंपनियों के भारत में व्यापार को सामान्यतः* व्यापार और प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जाता है।

• फिर भारतीय कंपनियाँ कृषि, खुदरा, दूरसंचार या अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ें तो उनके विरुद्ध अलग-अलग प्रकार का विरोध क्यों?

* किसानों के विषय में*

• कोई भी कंपनी किसान की भूमि या उसकी उपज को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं ले सकती।

• किसान किस कंपनी को अपनी उपज बेचेगा, यह उसके अधिकार और संबंधित कानूनों तथा अनुबंध की शर्तों के अधीन है।

• इसलिए कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका पर चर्चा तथ्यों, कानून और किसान के अधिकारों के आधार पर होनी चाहिए।

* सबसे महत्वपूर्ण बात*

• भारतीय हो या विदेशी—सभी कंपनियों के लिए समान नियम और समान प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए।

• मजबूत भारतीय कंपनियाँ बढ़ेंगी तो निवेश, उत्पादन, आपूर्ति-श्रृंखला और रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

• किसी कंपनी की आलोचना उसके मूल्य, गुणवत्ता, व्यापारिक व्यवहार और कानून के पालन के आधार पर होनी चाहिए, केवल इस आधार पर नहीं कि वह भारतीय है या विदेशी।

*अपने देश की कंपनियों का समर्थन करना है या नहीं—यह प्रत्येक नागरिक की अपनी पसंद है।*
*लेकिन निर्णय तथ्यों के आधार पर हो, अफवाहों के आधार पर नहीं। *

“अडानी” और “अंबानी” जिस जिस व्यापार में आये, विदेशी कंपनियों की बैंड बजा दी ।
बस यही कारण है कि इन विदेशी एजेंटों द्वारा अपने ही देश का बहिष्कार हो रहा है। जरा सोचो “Jio” के आने से पहले कितनी लूट थी ?

जब “अडानी एग्रो” शुरू हुआ तो “पेप्सिको” डोमीनोज “वालमार्ट” और मैकडोनाल्ड को क्या तकलीफ ? वो तो सालों से बड़े बड़े गोदाम लेकर बैठे हैं। रिलायंस रिटेल से अमेजन और फ्लिपकार्ट को टक्कर मिल रही है।
दुनिया को “5G” टेक्नोलॉजी चीन दे रहा है भारत में भी करोड़ों इन्टरनेट ग्राहक हैं परन्तु जैसे ही “रिलायंस Jio” ने ये टेक्नोलॉजी विकसित की तो ये “विदेशी एजेंटो” ने बहिष्कार चालू किया।
क्या अडानी, अंबानी आपसे जबरदस्ती कर रहा है ? दूसरी कंपनी से मंहगा है ? तो सस्ता वाला ले लो। 20 रुपये लीटर पेप्सी का पानी जो फाइव स्टार होटल में 200 से 250 रुपये लीटर मिलता है, हमें पसन्द है। ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार वाले। तो अपने ही देश का बहिष्कार क्यूँ ?

पतंजलि वाला आपको जबरदस्ती कोई प्रोडक्ट नहीं बेचता, हा वो HUL, COLGATE, जैसी विदेशी कंपनियों को टक्कर जरुर देता है फिर नफरत क्यों, दुष्प्रचार क्यों ?

ये विदेशी कंपनियां भारत से अरबों, खरबों रुपये का बिजनेस करती हैं हर महीने करोड़ों के विज्ञापन मीडिया को देती हैं तो क्या वो देशी कंपनियों को बदनाम करने के लिए कुछ करोड़ इन नेताओं ओर लीडरों को नहीं दे सकती ? इन विपक्षी समर्थक सिर्फ मोदी विरोध के चक्कर में अपने ही देश का बहिष्कार क्यों करते हैं ?
क्या “अडानी” और “अंबानी” नरेन्द्र मोदी (2014) के आने के बाद ही बिजनेस मैन बने ? पहले भिखारी थे ? अपनी इस सोच से दरअसल लोग विदेशी ताकतों के एजेंडे को बढा़ रहे हैं।।
अपने ही देश का नुकसान कर रहे हो। तुम ही हो जो स्वदेशी भारत का विरोध कर रहे हो कहते हो रुपया कमजोर क्यों हो रहा है।

याद है यही “अडानी” और “अंबानी” का बहिष्कार सबसे पहले राहुल गांधी ने “राफेल” सौदे को अटकाने के लिये किया था फिर झूठ फैलाने के लिए कोर्ट में मांफी मागी थी।
फिर ये विरोध शाहीनबाग में हुआ बताओ “CAA” से इनको क्या लेना-देना ?

वामपंथी संगठन, कांग्रेस समर्थन कर रहे हैं और कुछ अक्ल के अंधे इसे “मोदी विरोध” समझकर अफवाहों को हवा देते हैं। यह जो सरकार इतनी योजनायें चला रही है, यह पैसा टैक्स से ही आता है। हमारे देश की कम्पनियाँ आगे बढ़ेंगी तो देश का पैसा देश में रहेगा और लोगों को रोजगार भी मिलेगा।
बाकी आपकी मर्जी। सभी लोग समझदार हैं।

कोका कोला 1980 में भारत में आया और 11 soft drink Indian/other brands पर कब्जा कर लिया बाकी को Pepsi ने ले लिया ! कोई विरोध कोई शोर नहीं !

अमेजन लगभग हर शहर के बिजनेस व धर्म पर हमला कर रहा है ! कोई विरोध कोई शोर नहीं

Blue Dart, DHL & FedEx जैसी कूरियर सर्विस आई और अपने जहाज भी लाई। अब पूरे व्यवसाय पर कब्जा कर लिया ! कोई विरोध कोई शोर नहीं ।

चीनी और कोरियाई मोबाइल भारत में छा गये ! सबने लपालप खरीदा! कोई विरोध, कोई शोर नहीं !

Nestle, Maggi, Pepsi, ने फार्म सेक्टर में प्रवेश किया ! कोई विरोध, कोई शोर नहीं !

Vehicles mfg industry, two wheelers, वाहन और स्कूटर उद्योग में Honda, Hyundai इत्यादि ने अपना वर्चस्व जमाया जबकि हमारे उद्योग काफी थे ! कोई विरोध कोई शोर नहीं !

लेकिन भारत के अडानी, अंबानी जैसों के कृषि क्षेत्र में प्रवेश पर अचानक विरोध क्यों ? क्या वे जबरन हमारी फसल खरीद सकते हैं, कभी सोचा ? नहीं ! क्या पतंजलि भारत के लिए खतरा है ?

कोई भी कंपनी/व्यक्ति किसी किसान से उसकी जमीन जबरन नहीं ले सकता या ऐसी पैदावार फसल नहीं ले सकता जिसमें किसान की अनुमति नहीं है ! तो चीख पुकार क्यों ?

अचानक भारतीय कंपनी का ही विरोध क्यों ?
जबकि विदेशी कंपनियाँ बहुत समय से कई क्षेत्रों में उत्पादन कर रही हैं ! क्या यह साधारण सामान्य ज्ञान की कमी की वजह से नहीं है ? या किसी कुटिल, योजनाबद्ध तरीके से भारत में अशांति फैलाकर विभाजित करने की प्रकिया का अंग है ?
विचार जरूर करिये….

*”अडानी” और “अंबानी” जिस जिस व्यापार में आये, विदेशी कंपनियों की बैंड बजा दी ।*
*बस यही कारण है कि इन विदेशी एजेंटों द्वारा अपने ही देश का बहिष्कार हो रहा है। जरा सोचो “Jio” के आने से पहले कितनी लूट थी ?*

* स्वदेशी कंपनियों का विरोध क्यों?*

• *जियो* के आने से पहले दूरसंचार और इंटरनेट सेवाओं की कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं पर काफी बोझ था। जियो के प्रवेश के बाद इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा तेज हुई और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिले।

• *रिलायंस खुदरा* के विस्तार से अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी विदेशी कंपनियों को भारतीय बाजार में मजबूत प्रतिस्पर्धा मिली।

• *अडानी समूह* के विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार से विदेशी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

• *पतंजलि* ने दैनिक उपयोग की वस्तुओं के क्षेत्र में हिंदुस्तान यूनिलीवर और कोलगेट जैसी बड़ी कंपनियों को चुनौती दी।

• *प्रश्न यह है कि यदि भारतीय कंपनी प्रतिस्पर्धा करती है, तो उसका विरोध क्यों?*

• कोई कंपनी महँगी है या उसका उत्पाद पसंद नहीं है, तो उपभोक्ता के पास दूसरी कंपनी का उत्पाद खरीदने का विकल्प है। किसी को जबरन खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाता।

*विदेशी कंपनियों के लिए अलग नियम क्यों?*

• कोका-कोला, पेप्सी, अमेज़न, डीएचएल, फेडएक्स, होंडा, हुंडई तथा अनेक चीनी और कोरियाई कंपनियों ने भारत में बड़े बाजार बनाए।

• *विदेशी कंपनियों के भारत में व्यापार को सामान्यतः* व्यापार और प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जाता है।

• फिर भारतीय कंपनियाँ कृषि, खुदरा, दूरसंचार या अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ें तो उनके विरुद्ध अलग-अलग प्रकार का विरोध क्यों?

* किसानों के विषय में*

• कोई भी कंपनी किसान की भूमि या उसकी उपज को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं ले सकती।

• किसान किस कंपनी को अपनी उपज बेचेगा, यह उसके अधिकार और संबंधित कानूनों तथा अनुबंध की शर्तों के अधीन है।

• इसलिए कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका पर चर्चा तथ्यों, कानून और किसान के अधिकारों के आधार पर होनी चाहिए।

* सबसे महत्वपूर्ण बात*

• भारतीय हो या विदेशी—सभी कंपनियों के लिए समान नियम और समान प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए।

• मजबूत भारतीय कंपनियाँ बढ़ेंगी तो निवेश, उत्पादन, आपूर्ति-श्रृंखला और रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

• किसी कंपनी की आलोचना उसके मूल्य, गुणवत्ता, व्यापारिक व्यवहार और कानून के पालन के आधार पर होनी चाहिए, केवल इस आधार पर नहीं कि वह भारतीय है या विदेशी।

*अपने देश की कंपनियों का समर्थन करना है या नहीं—यह प्रत्येक नागरिक की अपनी पसंद है।*
*लेकिन निर्णय तथ्यों के आधार पर हो, अफवाहों के आधार पर नहीं। *

* विदेशी कंपनियों के लिए अलग और भारतीय कंपनियों के लिए अलग मापदंड क्यों?*

*आज एक सवाल गंभीरता से पूछने की आवश्यकता है—*

जब विदेशी कंपनियाँ भारत में आकर अलग-अलग क्षेत्रों में बड़ा कारोबार करती हैं, तब इसे व्यापार और प्रतिस्पर्धा कहा जाता है; लेकिन जब भारतीय कंपनियाँ उन्हीं क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं, तब उनके विरुद्ध इतना विरोध क्यों?

* दूरसंचार और इंटरनेट*

• जियो के आने से पहले भारत में मोबाइल इंटरनेट और दूरसंचार सेवाओं की कीमतें आम उपभोक्ता के लिए काफी अधिक थीं।

• जियो के प्रवेश के बाद दूरसंचार क्षेत्र में तीव्र मूल्य-प्रतिस्पर्धा हुई और इंटरनेट का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर बढ़ा।

• आज भारत में करोड़ों लोग सस्ता मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हैं।

• इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कंपनी भारतीय है या विदेशी; सवाल होना चाहिए—उपभोक्ता को क्या कीमत, गुणवत्ता और सुविधा मिल रही है?

* खुदरा व्यापार*

• रिलायंस खुदरा के विस्तार के साथ भारतीय खुदरा बाजार में बड़ी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

• अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी बड़ी कंपनियाँ पहले से ही भारतीय बाजार में व्यापक रूप से कारोबार कर रही हैं।

• यदि विदेशी कंपनियों को भारत में व्यापार करने का अधिकार है, तो भारतीय कंपनियों को भी प्रतिस्पर्धा करने का समान अधिकार होना चाहिए।

* कृषि क्षेत्र*

• कृषि क्षेत्र में किसी भी निजी कंपनी की भूमिका पर चर्चा किसान के अधिकार, कानून, मूल्य, अनुबंध और बाजार की पारदर्शिता के आधार पर होनी चाहिए।

• कोई भी कंपनी किसान की भूमि को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं ले सकती।

• किसान अपनी उपज किसे बेचेगा, यह लागू कानूनों और अनुबंध की शर्तों के अधीन है।

• इसलिए केवल यह कहना कि किसी बड़ी भारतीय कंपनी के कृषि क्षेत्र में आने से किसान स्वतः नुकसान में आ जाएगा—यह अपने आप में पर्याप्त तर्क नहीं है।

• असली प्रश्न होने चाहिए—किसान को कितना मूल्य मिलेगा? भुगतान कितनी जल्दी होगा? अनुबंध की शर्तें क्या होंगी? विवाद होने पर किसान कहाँ शिकायत करेगा?

* दैनिक उपयोग की वस्तुएँ*

• पतंजलि जैसी भारतीय कंपनियों ने दैनिक उपयोग की वस्तुओं के बाजार में स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनौती दी है।

• उपभोक्ता के पास अनेक विकल्प हैं।

• यदि किसी उत्पाद की कीमत अधिक है या गुणवत्ता पसंद नहीं है, तो उपभोक्ता दूसरा उत्पाद खरीद सकता है।

* विदेशी कंपनियों की मौजूदगी*

• कोका-कोला और पेप्सी जैसे शीतल पेय ब्रांड भारत में लंबे समय से कारोबार कर रहे हैं।

• अमेज़न ने भारतीय इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य बाजार में बड़ा स्थान बनाया है।

• डीएचएल, फेडएक्स और ब्लू डार्ट जैसी कंपनियाँ परिवहन एवं पार्सल सेवाओं में सक्रिय हैं।

• होंडा, हुंडई और अन्य विदेशी वाहन कंपनियों ने भारतीय वाहन बाजार में मजबूत उपस्थिति बनाई है।

• चीनी और दक्षिण कोरियाई मोबाइल कंपनियों ने भी भारतीय बाजार में लंबे समय तक बड़ी हिस्सेदारी बनाई।

इन कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करना भारतीय कंपनियों का भी अधिकार है।

* पैसा भारत में रहे, रोजगार भारत में बने*

• किसी भी कंपनी का भारतीय बाजार में कारोबार होने पर उसके प्रभाव को केवल उसके मालिक की राष्ट्रीयता से नहीं, बल्कि निवेश, उत्पादन, कर भुगतान, रोजगार और आपूर्ति-श्रृंखला के आधार पर देखना चाहिए।

• भारतीय कंपनियाँ मजबूत होंगी तो देश के भीतर उत्पादन और व्यापार की क्षमता बढ़ सकती है।

• लेकिन साथ ही सभी कंपनियों के लिए समान कानून, पारदर्शी नियम और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा आवश्यक है।

*❓ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न*

• विदेशी कंपनी भारत में व्यापार करे—स्वीकार्य।

• विदेशी कंपनी भारतीय बाजार में विस्तार करे—स्वीकार्य।

• विदेशी कंपनी भारतीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करे—स्वीकार्य।

तो भारतीय कंपनी विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करे तो समस्या क्यों?

• किसी कंपनी का समर्थन या विरोध उसके व्यापारिक व्यवहार, उत्पाद, कीमत, गुणवत्ता और कानून के पालन के आधार पर होना चाहिए।

• केवल भारतीय होने के कारण किसी कंपनी को महान और केवल विदेशी होने के कारण किसी कंपनी को गलत मानना भी उचित नहीं है।

* अंतिम बात*

भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जहाँ भारतीय और विदेशी—दोनों कंपनियाँ समान नियमों के अंतर्गत प्रतिस्पर्धा करें।

मजबूत भारतीय कंपनियाँ हों, विदेशी निवेश भी आए, उपभोक्ता को विकल्प मिले, किसान को उचित अवसर मिले और सबसे महत्वपूर्ण—नियम सभी के लिए समान हों।

*देशहित का अर्थ किसी एक कंपनी का समर्थन करना नहीं है।*
*देशहित का अर्थ है—निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ता का हित, किसान का अधिकार, रोजगार और भारत की आर्थिक मजबूती। *

 

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