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टपकती छतें – टूटते घर और आज की नारी

*”जिन लड़कियों ने टपकती छतों के बावजूद अपने पतियों का साथ नहीं छोड़ा, आज वही हमारी माता जी है”*

यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि पूरी एक पीढ़ी की कहानी है।

एक समय था जब घर की छत बारिश में टपकती थी, दीवारों में दरारें होती थीं, बिजली घंटों गायब रहती थी, लेकिन फिर भी घर नहीं टूटते थे। महिलाएँ अपने पतियों के साथ भूख और अभाव भी सह लेती थीं, पर उनका हाथ नहीं छोड़ती थीं। वे जानती थीं कि गरीबी कोई अपराध नहीं, बल्कि बेवफाई अपराध है। वे अपने पति के साथ मिलकर परिस्थितियों से लड़ती थीं, पति से नहीं।

आज वही महिलाएँ सफेद बालों के साथ हमारी माँएँ और दादियाँ हैं। उनके चेहरों पर झुर्रियाँ ज़रूर हैं, लेकिन उनके ज़मीर पर कोई बोझ नहीं। क्योंकि उन्होंने अपने रिश्ते को वफ़ादारी और समर्पण से निभाया।
लेकिन आज का समय बदल चुका है।

आज बहुत-से रिश्ते प्रेम से पहले सुविधाओं को देखते हैं। कुछ लोग विवाह को जीवन का साथ नहीं, बल्कि एक समझौता मानते हैं, जहाँ ज़रा-सी कठिनाई आते ही साथ छोड़ देना आसान लगता है। सोशल मीडिया ने लोगों को दूसरों की चमकती हुई ज़िंदगी तो दिखाई, लेकिन उनके संघर्ष और दुख नहीं दिखाए। नतीजा यह हुआ कि लोग अपनी ज़िंदगी की तुलना दूसरों की दिखावटी दुनिया से करने लगे।

यह भी सच है कि हर रिश्ता एक जैसा नहीं होता। यदि किसी रिश्ते में अत्याचार, हिंसा, नशे की लत, या जान और सम्मान को खतरा हो, तो वहाँ चुप रहना वफ़ादारी नहीं, बल्कि स्वयं पर अत्याचार हो सकता है।

लेकिन जहाँ केवल गरीबी, कठिन परिस्थितियाँ और समय की परीक्षा हो वहाँ साथ निभाना ही सच्चे प्रेम की पहचान बनता है”।

आज भी ऐसे असंख्य दंपति हैं जो कठिन हालात में एक-दूसरे का हाथ थामे हुए हैं, और यही रिश्ते समय के साथ और अधिक मज़बूत होते जाते हैं।

घर केवल ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि धैर्य और विश्वास से बनते हैं। रिश्ते केवल पैसों से नहीं, बल्कि भरोसे से चलते हैं और जो लोग कठिन समय में एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते, समय भी उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता।

अंत में एक प्रश्न… क्या सचमुच ज़माना बदल गया है, या हमने रिश्तों की कद्र करना छोड़ दिया है……?

“विचार अवश्य कीजियेगा”

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